★बलात्कार★

बलात्कार

★बलात्कार★

प्रस्तावना:

अब राम को भजने वाले गाँधी रहे नहीं
न हीं रहे वेदों के रचयिता आर्य |
देवभूमि आर्यवर्त बदल गया है अब
होने लगे हैं यहाँ भी घृणित निंदित कार्य ||

सारे जग में क्या ऐसा देश था कहीं ?
जहाँ एक भी अनार्य थे नहीं |
जहाँ अपनी ऋचाओं से वेद देवियों के गुण गाते थे
देवों के क्या देवियों के चरण भी पूजे जाते थे ||

उसी कल के आर्यवर्त, आज के हिन्दुस्तान में
होने लगे कार्य ऐसे जिनका जिक्र न वेद पुराण में |
पापियों का नाम भले ही शुरू होता राम से
पर ये कलयुगी रावण पहचाने जाते काम से ||

★कविता का विषय:

कभी देश में भूखमरी
कभी देश में दंगे चोरी |
अब असह्य हैं नीचों के कार्य
त्वरित मिटा देने चाहिएँ ऐसे अनार्य ||

जिनके कारण बेटियों को भय है
उन दुष्टों को अदण्ड से अभय है |
दो उन्हे दण्ड अब न्याय करो सरकार
बंद हो, अब रुके बलात्कार ||

यह महापाप दुष्कृत्य, दुष्कर्म है
जो दुष्ट, नीच, निशाचरों का मर्म है |
उन अंधों का अंधा है धर्म
जो सिखलाए नहीं क्या है सत्कर्म ||

किस जड़ता में किन मूर्दों के द्वारा
होता यह दुष्कर्म साकार |
दोषियों को दण्ड प्रचण्ड मिले
बंद हो, अब रुके बलात्कार ||

क्या अब यह सामाज मनुजों का नहीं
व्यभिचारियों, दरिंदों का डेरा है ?
दुनिया कितनी खुशहाल और सवेरे में उन्मुक्त
क्यों हमारे यहाँ अभी भी गहन अंधेरा है ?

यह एक सामाजिक मुद्दा है
जिस पर सारा समाज मौन है |
कितना गिरेगा हमारा सामाजिक स्तर
कभी आर्य थे जो अब विचारें कौन हैं ?

एक नाबालिग, एक कोमलांगी, सुकुमारी
क्यों अनंत बाह्य-अंतस पीड़ा सहे ?
कैसा यह पापियों का समाज ,
जो पाप देख भी चूप, मौन, निष्पंद रहे ?

बालिकाओं , बेटियों, लड़कियों को
जीने का जरूर अधिकार है |
क्यों करते को दुष्कर्म निकृष्ट
जो अघ, अतिनिंद्य बलात्कार है |

यह दुष्कर्म उनका भविष्य बिगाड़ाता
यह दुष्कर्म उन्हे जीवन भर ताड़ता |
क्यों नारियाँ इस समाज में पीड़ित हैं ?
जो जहान् में प्रकृति में रत्न सम जड़ित हैं ||

जिस देश, देवी दुर्गा, शारदा पूजी जाती हैं
लक्ष्मी गौरी घर-घर आदर पाती हैं |
उसी देश में कैसी महामारी या अत्याचार है
कोख में भ्रूण हत्या दिवा में होता बलात्कार है ||

★आह्वान/निष्कर्ष:

उठो उस देश के वासियों
जिसके निवासी आर्य थे |
वेद, विद्या, वैद्य, कौशल-कला के
सबके जो प्रथम आचार्य थे ||

सच है समाज सारा असभ्य नहीं
पर त्रुटिपूर्ण अपना समाज जरूर है |
प्रचीनता भूल गए नवीनता के कारण
जो ब्राह्मचर्य नहीं आसुरी प्रवृत्ति का शुरूर है ||

सभी पाप बंद हों, अंध, अधर्म बंद हों
बंद हो कुमारियों का कुत्सित बलात्कार |
प्यार की ज्योति जलाओ अत्याचार की नहीं
पुरातन रीतियों-नीतियों पर करो पुनर्विचार ||

क्षमा अक्षम्य को नहीं चाहिए
चाहिए प्रचंड दंड दोषियों को |
सशक्त करों, शिक्षित करो, संकुचित नहीं
खुब पढ़ाओ, आगे बढ़ाओ बेटियों को ||

पाप से बचो ! कुरीतियों से बचो !
बलात्कारियों को हरगिज न बख्शो |
हवस-भूख का करो डटकर दुत्कार
बंद हो, अब रुके बलात्कार ||

— अमर कुमार रतन