इंतजार करना

इंतज़ार करना

इंतजार करना

"प्यार करती हो मुझसे.?" वीर ने आयत से अचानक ही पूछ लिया था। उसकी आंखों में हां और चेहरे पर असमंजस के भाव देखकर बोला "चिंता मत करो आयत, तुमसे कुछ मांग नहीं रहा और ना ही कोई उम्मीद लगाए हूँ पर जाने से पहले तुम्हारे दिल की बात जानना चाहता हूँ।" "हां वीर, प्यार है पर......." "बस यही सुनना था और कुछ नहीं।"वो मुस्कुरा कर बोला और बिना पीछे पलटे अपने डिब्बे में चढ़ गया। आयत आंखों में आंसू लिए ट्रेन को तब तक देखती रही जब तक वह उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई।     
              वीर और आयत तीन साल पहले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मिले थे। जहां वीर को आयत के बोलने का अंदाज पसंद था, वहीं आयत को वीर का स्वभाव। कार्यक्रम तो ख़त्म हो गया पर दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी।तीन साल तक दिल में छुपे प्यार का इज़हार आज हो चुका था। वीर हमेशा से ही फ़ौज में जाना चाहता था और आज ट्रेनिंग के लिए जा चुका था।दो साल तक दोनों कभी फोन पर बातें करते, तो कभी व्हाट्सअप पर चैट। यह जानते हुए भी कि ये सपने कभी पूरे नहीं होंगे,दोनों अपने भविष्य की बातें करते और सपने संजोते। दो साल बाद वीर फ़ौजी बन चुका था और अब उसकी पोस्टिंग होनी शुरू हो चुकीं थी। बातचीत ज़रूर कम हुई थी पर दोनों का प्यार नहीं।

           एक बार आयत,वीर से बात करते वक्त फ़फ़क पड़ी,, "वीर यह कैसा रिश्ता है जिसका कोई नाम हीं नहीं पर सारे नामों से ऊपर है।हम कैसी अधूरी ज़िंदगी जी रहे हैं। प्यार है पर मंजिल नहीं।"

वीर समझाते हुए बोला था,"कान्हा और राधा के रिश्ते को क्या कहती हो आयत, किस नाम से बुलाती हो उनके रिश्ते को। प्यार तो दोनों में था ना और कितना प्रेम था यह बताने की जरूरत तो नहीं है ।आयत, अधूरी नहीं है हमारी कहानी, बल्कि अनंत है। लोगों की मोहब्बत मंजिल पा कर खत्म हो जाती है पर हमारी कहानी हमेशा चलती रहेगी पगली! क्योंकि ना हम मिलेंगे और ना ही कहानी खत्म होगी।"

"तुम्हारी यह बड़ी-बड़ी बातें मुझे समझ ही नहीं आती वीर। बस ऐसे घुमा देते हो बात को कि समझ नहीं आता ,खुश होऊँ कि रोऊँ। यू स्टूपिड।"कहकर वह रोने लगी। आजतक आयत ने वीर को नहीं बताया था कि उसकी 'पर' की पीछे की वजह क्या थी ।बताती भी तो क्या ये कि वह आयत शुक्ला है और वीर, वीर प्रताप सिंह।उनके पीछे लगी ये जातियां उन्हें कभी एक नहीं होने देंगे।आयत के कट्टर सोच वाले पिता रिश्ते के लिए मानना तो दूर, सुनकर ही पता नहीं क्या कदम उठा लें। उनके खिलाफ जाने की हिम्मत उसमें थी भी नहीं। शायद वीर भी यह समझता था तभी तो बिना कुछ कहे सब समझ जाता था। तीन साल बीत गए। वीर प्रताप सिंह अब मेजर बन चुके थे और आतंकियों एवं दुश्मनों के लिए खौफ का नाम थे ।मेडल्स, स्टार्स की भरमार थी वीर के पास।          उस दिन पापा न्यूज़ सुन रहे थे और आयत दूसरे कमरे में बैठी WhatsApp चेक कर रही थी। वीर का ऑडियो मैसेज पड़ा था, दो दिन पहले का। "इस बार ज्यादा दिन के लिए आ रहा हूं ।शायद मम्मी ने कोई लड़की देखी है। मिलूंगा तुमसे आयत, एक आखिरी बार। तुम्हें हक देना चाहता था कि अगर शहीद हो जाऊं तो तुम शहीद वीर प्रताप सिंह की विधवा कहलाओ, पर.....।" हर बार यह 'पर' ही तो था जो बीच में आ जाता था। इस बार वीर की आवाज़ से उसकी आँखों की नमी का अंदाज़ा लगाया जा सकता था। तभी न्यूज़ वाले कमरे से आवाज आई-"सर्च ऑपरेशन में तीन आतंकयो को मार गिराने के बाद मेजर वीर प्रताप सिंह शहीद ।"       आयत दौड़कर दूसरे कमरे में गई ।एक तरफ फोन देखती ,दूसरी तरफ TV ।अभी तो मैसेज सुना, कि वह आ रहे हैं, मिलेगें भी फ़िर....।" "एक और जवान शहीद।" पापा ने चाय का कप मुंह में लगाते हुए कहा। आयत कुछ नहीं बोली।चुपचाप कमरे में जाकर सिमट गई ।अकेले में ही बोलती रही "किस हक से तुम्हारे शरीर से चिपक कर रोऊँ? सबके सामने रो भी तो नहीं सकती ना!कोई हक नहीं है मेरा, क्या कहूंगी, क्या रिश्ता था हमारा ?कोई क्या जाने की सबसे ज्यादा हक तो मेरा ही है तुम पर!! हमारे रिश्ते का नाम नहीं है पर...... पर.. हमारा दिल एक है।"वह बिफर पड़ी। रह-रहकर वीर की एक ही बात कानों में गूंज रही थी "हमारे रिश्ते की मंजिल नहीं वह बस चलता रहेगा। किस्सा खत्म ही नहीं होगा।"

आयत ने फोन उठाया WhatsApp पर वीर की प्रोफाइल को खोली। स्टेटस था..... आ रहा हूं मैं, इंतजार करना। भौंहों पर सिकुड़न और आंखें आंसुओं से लबालब भरी पड़ी। आयत ने बस एक क्लिक किया वीर ब्लॉक हो चुका था। कहानी खत्म नहीं हुई थी क्योंकि दोनों के दिल तो अब भी एक थे ना।

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