तीन कसमें

पहली कहानी

तीन कसमें

आज़ वो बहुत खुश था। उसे मिल गया था वो मुकाम जिसकी ख्वाहिश उसे सालों से थी। इतनी खुशी के बाद भी, कुछ तो था उसके भीतर जो कचोट सा रहा था उसके मन को।

आज सुबह जब उसने अपने ऑफिस फोऩ किया था छुट्टी के लिये लिये, तो चौंक सी गयी थी अकिंता,जो उसकी कम्पनी की एच.आर. मैनेजर है।
कुछ चिंतित सी होकर पूछा था उसने ,"क्या हुआ अखिल ?? तबियत तो ठीक है ना तुम्हारी??"

अखिल ने बस कहा था ," मै ठीक हूँ अकिंता, बस कुछ पर्सनल काम है, तो आज नही आ सकूंगा मै। तुम फिक्र मत करो"।

पर्सनल काम की बात सुनकर अकिंता ने बात को ज्यादा नहीं खींचा। "अपना ख्याल रखना तुम", कहकर उसने फोन काट दिया था।

उसकी फिक्र यूँ ही नहीं थी, इतनी बड़ी कम्पनी में एक ऊचीँ पोस्ट पर काम करना बहुत टेढ़ी खीर होता है़। इसके बाद भी अखिल ने छुट्टियाँ ना के बराबर ली थी। वो शांत सा, ऑफिस की राजनीति से दूर अपने काम से काम रखने वाला था।

शायद इसीलिये पसंद भी था वो अंकिता को। उसने सोचा भी एक-दो बार कि वो बता दे अखिल को अपने मन की बात, पर उसने अभी कुछ दिन इतंजार करना सही समझा। इंतजार अखिल की ओर से इजहार का।

उधर, अपने पर्सनल काम के लिये जाने को, अखिल ने आज़ मेट्रो नहीं ली थी। उसने निकाली थी बुलेट, वो बुलेट जो उसने खरीदी थी किसी की पसंद को ध्यान में रखकर।

" आई लव द सिल्वर वन" , वो अक्सर कहती थी जब वो दोनो मिलकर बनाते थे प्लान्स, अपनी आने वाली जिन्दगी के। 

उसी बुलेट पर वो चला जा रहा था एक जाने पहचाने रास्ते पर, वो रास्ता जिस पर वो ना जाने कितनी ही बार आया होगा उसके साथ। मई के महीने के उस दिन मौसम भी सुहाना सा था, शायद मौसम भी खुश था उसकी खुशी में ।

आज सुबह भी वो तैयार ही हो रहा था ऑफिस जाने को जब तिवारी जी का फोन आया था। तिवारी जी एक बहुत बड़ी प्रकाशन कम्पनी के मुख्य सम्पादक थे, मिलने को बुलाया था। वही था उसका पर्सनल काम।

बुलेट की भारी आवाज पर भी उसके मन का कोलाहल भारी था। कुछ दिन पहले ही वो तिवारी जी को अपनी "पहली कहानी" दे आया था। उन्होने कहा भी था ," देखो अखिल ! मै तुम्हारी कहानी रख तो ले रहा हूँ, पर अभी से कोई उम्मीद मत रखना।"

अखिल इतना भी नादान नहीं था। अच्छे से समझता था ये बातें। हजारों लोग होते हैं जो शब्दों को सार्थक तरीके से लिख सकें, पर जरुरी तो नहीं कि सबकी कहानी को प्रकाशित किया जा सके। पर जब आज तिवारी जी ने उसे देखते ही कुर्सी से उठकर कहा ,

" आइये ऱाइटर साहब ! आपकी ही बातें हो रही थीं !", तो बस अनायास ही उसे वो ख्वाब पूरा होता दिखा था जो उन दोनों ने मिलकर देखा था उन सीढ़ियों पर।

तिवारी जी कह रहे थे कि उनके पूरे सम्पादक मण्डल को कहानी बहुत पसन्द आई थी और वो जल्द से जल्द उसे प्रकाशित करना चाहते हैं, कान्ट्रैक्ट पर सहमति चाहते थे। अखिल को तो एकबारगी यकी़न नही हुआ था, एक लाख रुपये और किताब की बिक्री पर रॉयल्टी अलग से।

यकीन तो उसे खुद पर कभी भी नहीं था, बस उस पागल लड़की को था , ना जाने क्यूँ। बुलेट पहुँच गयी थी उन सीढ़ियों के पास, जिन पर बैठकर देखे थे उन दोनों ने वो सारे ख्वाब। बाइक से उतरकर अखिल उस इमली के पेड़ के पास पहुँचा, जो गवाह था उनके प्रेम का।

एक फिल्मी दिल बना हुआ था उस पर। उस पागल लड़की ने ही बनाया था, अपनी स्कूटी की चाबी से, और लिखा था उस दिल में, " तान्या लव्स अखिल". ठीक उस दिल के नीचे तीन लाइनें और लिखी थी।  जिनको लिखा तो तान्या ने ही था ,पर अखिल उनमें से दो को काट चुका था पिछले तीन सालों में। आज वो आया था वो तीसरी लाइन काटने। ये लाइनें नहीं थी बस ,ये वो तीन हिस्से थे एक कसम के, जो उसे हर हाल में पूरी करनी थी।

वो लाइनें थी ....
१. गेट अ गुड जॉब।
2. बॉय योर ओन हाउस।
3. गेट योर बुक पब्लिश्ड।

तीसरी लाइन काटने के बाद वो आकर बैठ गया था उन सीढ़ियों पर और सीढ़ियाँ ले गयीं उसे तीन साल पहले की उस शाम तक जब ये लाइनें लिखी गयीं थीं। उस शाम तान्या चुप ही रही सीढ़ियों तक के रास्ते में।

वहाँ पहुँचकर अखिल ने उसका हाथ पकड़कर पूछा था,
" तनु ! बताओ ना क्या बात है ? कब से देख रहा तुम बस चुुप हो। बताओ, तुमको मेरी कसम है"।

तान्या का जवाब वो था जिसे वो आज़तक ना भूल पाया है।

" सुनो, मुझे पता है तुम बहुत कुछ कर सकते हो, तुम में वो सब कुछ है जो सफल होने को चाहिये। पर तुम कोशिश नहीं करते। मैनें बहुत सोचा और मुझे लगता इसकी वजह मै हूँ। तुम मुझसे इतना प्यार करते कि अपने कैरियर पर ध्यान ही नहीं देते। तो मैने एक फैसला लिया है।" तान्या ने कहा था और उकेर दी थीं वो लाइनें उस पेड़ पर।

वो बोल रही थी," ये वो शर्त है जो पूरी करनी होगी मुझे पाने के लिये। जब तक ये पूरी नी कर लेना, मुझसे कोई नाता ना रखना"  |

अखिल को लगा था उसकी दुनिया ही लुट गयी है
उसने हर कोशिश की उसे रोक ले, हाथ तक जोड़े तान्या के आगे, पर वो ना रुकी ,जिद्द की पक्की थी वो।

बस जाते जाते कह गयी थी, "सुनो, ज्यादा देर मत करना। क्या पता जब तक तुम आओ, मै तुम्हारी ना रहूँ।"

आज अखिल ने पूरी कर ली थी वो कसम। उसने जी तोड़ मेहनत की थी इन तीन सालों में। खुद को भटकने नहीं दिया था बिल्कुल। वो समझता था अंकिता के हाव-भावों से उसके मन की बात, पर वो खुद को तो कब का किसी और के नाम कर चुका था।

"कसम तो पूरी हो गयी पर देर तो नहीं हो गयी", बस यही कश्मकश थी उसके मन में। पर बताना तो होगा ही उसको। उसने अपना फ़ोन बाहर निकाला, नंबर सेव कर रखा था उसने अपनी तनु का, पर कसम की वजह से कभी बात करने की कोशिश नहीं की थी।

उसने फोन मिलाया, पर एक रिंग होते ही किसी अनजान डर से काट दिया। फिर कुछ सोचा और एक तस्वीर खींची उन कटी हुयी लाइनों की ।

फिर फोन पर व्हाट्सएप्प खोला और भेज दी तनु को एक मैसेज के साथ। मैसेज में लिखा था ,

" तनु ! आइ डिड इट फॉर अस। "

फिर वो ताक़ता रहा अपने फोन की स्क्रीन को।
कुछ भी नहीं।
उसका "लास्ट सीन" भी विजिबल नहीं था अखिल को।

सिंगल टिक था उसके मैसेज पर. "शायद ब्लॉक कर दिया मुझे", सोचने लगा था वो। पर तभी, सिंगल टिक से डबल टिक हो गया। ऑनलाइन आ गयी थी तनु।

अखिल को लगा उसकी साँसे ना खत्म हो जायें, उसकी धड़कन की तेजी के आगे ।

" ऑनलाइन " की जगह अब दिखा रहा था

"टाइपिंग..." !!